Khudi se Rubaroo

इस उड़ान की तयारी तो कब से चल रही थी …
इस सफ़र को सोच कर घबराई तो खूब थी मैं …

कांपते मन से ही तो पहला कदम रखा था मैंने …
अटकती , फिसलती तो मैं अब भी हूँ …
पर एक एक कदम जो मैंने अकेले तये किया …
वो मुझे खुद के और पास लाता गया…

खुद से ही लड़ना सीख लिया …
खुद ही को डांट के सुधारना सीख लिया…
खुद ही अपने उदास मन को समझा कर हसना सीख लिया…
खुद ही के ललचाये मन को गलत काम करने से रोक लिया…
खुद ही खुद को खुश करने को झल्ली सी हरकते करना सीख लिया…
खुद ही अपने हर डर को दबा कर मैंने जीतना सीख लिया…
खुद ही अपने फैसले करने का जिगरा करना शुरू कर लिया…
खुद ही आँखों में भरे पानी को छलकने से बचा लिया…
खुद ही मन की दीवारों को तोड़ कर खुद को हर छोटी बात पर किटकिट करने से बचा लिया…
खुद ही कभी कभी चुप रह के अनचाही चीज़ो को सराना आ गया…
खुद ही अपनी गलतियों पर थोढ़ा रो-धो कर आगे बड़ना सीख लिया…

इस एहसास से जब मुझे लगता के मैंने खुद ही के साथ जीना सीख लिया …
तभी एक नयी आहट एक नई चुनोती लाती है …
तो हिचकिचाती , गिरती , चोट खाती मैं …

पर अपने इस सफर में अब खुद में ही हर पल एक नया होंसला ढूंढती हूँ…
मुढ़ कर जब खुद को देखती  हु तो खुदी पर नाज़ करती हूँ…
बादल को देख कर अपनी उड़ान को ऊँचा करती हूँ…
अब खुद ही में हर पल एक नया विश्वास , नयी उमंग देखती हूँ …